Tagged: परिवार

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एक कविता बेटे पर

एक कविता बेटे पर घर की रौनक है #बेटियां,तो #बेटे हो-हल्ला है,गिल्ली है,डंडा है,कंचे है,गेंद और बल्ला है, बेटियां मंद बयारो जैसी,तो अलमस्त तूफ़ान है बेटे,हुडदंग है,मस्ती है,ठिठोली है,नुक्कड़ की पहचान है बेटे, आँगन...

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प्रासांगिक है डॉ. आम्बेडकर

भारतीय इतिहासकारों ने डॉ. आम्बेडकर जी को उस स्थान को नहीं दिया है । जिसके वो योग्य हैं! आज भी प्रासांगिक है डॉ. आम्बेडकर ऐसा मेरा मन्ना है । यह कुछ भी हो सकता है...

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